“ख़ामोशियों की आवाज़”

कुछ शब्द होंठों तक आकर
ख़ामोशी में ढल जाते हैं,
कुछ सपने आँखों में रहकर
नींद से पहले जल जाते हैं।

हर रोज़ हँसते हैं दुनिया के आगे,
पर भीतर कोई टूटता रहता है,
भीड़ में भी अकेलापन
साया बनकर साथ चलता रहता है।

वक़्त ने सिखाया मुस्कुराना,
दर्द को गीत बना लेना,
जो कहा ना जा सका कभी
उसे आँसुओं में बहा देना।

पर यक़ीन अब भी ज़िंदा है दिल में,
कि सुबह ज़रूर आएगी,
ये रात चाहे जितनी लंबी हो
एक दिन ख़ुद हार जाएगी।

कोई टिप्पणी नहीं