मकर संक्रांति

सूरज ने बदली अपनी चाल,
उत्तरायण का आया काल।
ठिठुरन छोड़, मुस्काए खेत,
धान्य से भरने लगे हर पेट।

तिल-गुड़ की मीठी सी बयार,
बांधे रिश्तों में फिर से प्यार।
पतंगों ने छेड़ा आसमान,
हर दिल में जागा नया अरमान।

बीते दुख अब पीछे छूटें,
आशा के दीप हर मन में फूटें।
मेहनत का फल जब रंग दिखाए,
किसान की आँख भी मुस्काए।

संक्रांति कहे—आगे बढ़ो,
अंधेरे से अब न तुम डरो।
नए उजाले संग जीवन गढ़ो,
मकर संक्रांति, खुशियाँ भर दो।

कोई टिप्पणी नहीं