टैरिफ की दीवारें
सागर पार से आया एक फ़ैसला,
काग़ज़ पर मुहर, बाज़ार में भूचाल चला।
टैरिफ की दीवारें ऊँची कर दी गईं,
मुनाफ़े की भाषा में मानवता दब गई।
कहा गया— देश पहले, व्यापार बाद में,
पर चोट पड़ी हर उस हाथ पर जो जुड़ा था चेन में।
किसान, मज़दूर, छोटे सपनों का जहाज़,
सबके पाल फट गए, बदला वैश्विक मिज़ाज।
डॉलर मुस्काया, पर दुनिया रोई,
महँगाई की आँधी हर गली में सोई।
सीमा रेखाएँ अब माल पर खिंचीं,
विश्वास की डोरें चुपचाप बिखरीं।
जो बाज़ार कल तक खुला-खुला था,
आज संदेह के पहरों में जकड़ा था।
सवाल यही— सुरक्षा या सत्ता का खेल?
या चुनावी भाषणों का नया रेल?
इतिहास गवाह है, दीवारें टिकती नहीं,
व्यापार बंद हो तो प्रगति रुकती नहीं।
टैरिफ घटेंगे, संवाद बढ़ेगा एक दिन,
जब लाभ नहीं, इंसान बनेगा प्राथमिक चिन्ह।

Post a Comment