गणतंत्र का सूरज
लाल किले से नहीं,
हर दिल से उठी आवाज़ है,
26 जनवरी
सिर्फ़ तारीख़ नहीं,
संविधान का जीवित राज़ है।
कलम से लिखी आज़ादी,
क़ानून में ढली पहचान,
न झुकेगा अब कोई भारत,
क्योंकि जनता है यहाँ भगवान।
धर्म नहीं, जाति नहीं,
सिर्फ़ इंसान की बात चली,
जब गणतंत्र बना,
तो उम्मीद हर घर में पली।
आओ संकल्प लें आज हम,
नफ़रत नहीं, न्याय बोएँगे,
गणतंत्र ज़िंदा तब रहेगा,
जब हम उसे रोज़ जीएँगे।

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