रिश्तों की डोर
रिश्ते धागों जैसे होते हैं,
नज़र नहीं आते पर जोड़ते हैं।
कभी हँसी में खिल उठते हैं,
कभी खामोशी में भी बोलते हैं।
कभी माँ की ममता बन जाते,
कभी दोस्ती की राह सजाते।
कभी पिता का सहारा बनकर,
मुश्किल में हाथ थामे आते।
रिश्ते न हों तो दुनिया सूनी,
भीड़ में भी तनहाई लगे।
प्यार, भरोसा, थोड़ी समझ हो,
तो हर दूरी भी पास लगे।
इसलिए रिश्तों को संभाल कर रखना,
ये अनमोल ख़ज़ाना होते हैं।
टूट जाएँ तो दर्द देते हैं,
निभ जाएँ तो ज़िंदगी बन जाते हैं।

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