खामोश चीखें
धुएँ में लिपटा एक मंदिर खड़ा है,
ईश्वर भी आज पत्थर-सा जड़ है।
टूटी मूर्ति, जली हुई आस्था,
किससे पूछे—ये कैसा शहर है?
माँ की गोद में सिमटी बच्ची,
डर की भाषा सीख रही है।
खिलौनों की जगह हाथों में
यादें—लहू से भीग रही हैं।
घर नहीं जले, सपने जले हैं,
दरवाज़ों से उजाला भागा।
नाम पूछकर मारी गई इंसानियत,
धर्म ने आज खुद को दागा।
न कोई युद्ध, न कोई सीमा,
फिर ये लाशें क्यों बिछीं?
सिर्फ़ इतना कसूर था उनका—
वे अल्पसंख्यक थे, इसलिए चुप रहीं।
बांग्लादेश की मिट्टी पूछती है,
क्या यही था आज़ादी का अर्थ?
जहाँ पूजा करना अपराध बने,
और डर तय करे जीवन का पथ।
कविता नहीं, ये आरोप-पत्र है,
हर उस आँख के नाम जो बंद रही।
जब भी चुप्पी ने राज किया,
हिंसा और भी नंगी होती गई।
अगर अब भी नहीं बोले हम,
तो इतिहास फिर खुद को दोहराएगा।
धर्म नहीं, मानवता मरेगी—
और ईश्वर भी हमसे मुँह मोड़ जाएगा।

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