अरावली की वाणी
पत्थरों की छाती पर लिखा
समय का मौन इतिहास,
अरावली खड़ी है आज भी
लिए युगों का विश्वास।
जब धरती नवयौवना थी,
जब नदियाँ बोलती थीं,
तब अरावली की चुप्पी में
सभ्यताएँ डोलती थीं।
सूखी हवाओं को थामे,
रेत को देती है राह,
मरुस्थल की बढ़ती चाल पर
बन जाती है खुद दीवार।
हर चट्टान में तपस्या है,
हर दरार में प्राण,
यह पहाड़ नहीं केवल,
धरती की आत्मा महान।
शहरों के शोर से दूर कहीं
अब भी साँस लेती है,
अरावली आज भी माँ बनकर
धरती का दर्द सहती है।
आओ, इसकी चुप भाषा को
हम सुनना सीखें आज,
वरना कल इतिहास पूछेगा—
क्यों टूट गया ये ताज।

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