चीनी मांझा
आसमान में हँसती पतंग,
नीचे सिसकता शहर है।
एक धागा जो खेल था कभी,
आज मौत का ज़हर है।
उँगलियों से फिसलती डोर,
गले पर लिख गई कहानी,
एक पल की लापरवाही ने
छीन ली किसी की ज़िंदगानी।
ना पतंग दोषी, ना हवा,
ना वो बच्चा जो खुश था आज,
कसूरवार है वो लालच
जो बना धागे को हथियार।
त्योहार अगर खून माँगे,
तो वो त्योहार नहीं रह जाता,
जब जश्न ही गला काटे,
तो इंसान शर्म से झुक जाता।
आओ, धागे को फिर धागा रहने दें,
खेल को खेल की हद में रखें,
ताकि हर गली, हर छत से
सिर्फ़ खुशियाँ उड़ें—
किसी का गला नहीं।

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