युद्ध की राख

धरती रोई, आकाश सिसका,
जब बारूद ने गीत लिखे।
नदियाँ भी सहमी-सी बहतीं,
जब शहरों ने आँसू पिए।

कहीं ईरान की गलियों में धुआँ है,
कहीं इज़राइल की रातें जागती हैं,
दूर कहीं संयुक्त राज्य अमेरिका की सत्ता
युद्ध की शतरंज सजाती है।

पर पूछो उन मासूमों से,
जिनके घर अब खंडहर हैं,
किसकी जीत और किसकी हार —
सबके दिल तो घायल हैं।

तलवारों से कभी नहीं
शांति का सूरज उगता है,
नफ़रत की आग में जलकर
मानवता ही सिसकता है।

आओ फिर से वचन करें हम —
राख से जीवन बोएँगे,
सीमा चाहे लाख बनें,
दिल से दिल फिर जोड़ेंगे।

क्योंकि अंत में सच यही है —
न युद्ध किसी का अपना है,
धरती माँ की गोद में
सिर्फ शांति ही सपना है। 🌍🕊️

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