🌍 “जब धरती रोती है”
आसमान में बारूद घुला,
हवा भी अब ज़हरीली है,
जहाँ कभी चिड़ियाँ गाती थीं,
वहाँ खामोशी ही फैली है।
तेल के कुंड जल उठे जब,
काला बादल छा जाता है,
“काली बारिश” बनकर ज़हर,
धरती पर बरस जाता है।
नदियाँ रोतीं, जंगल जलते,
मछलियाँ दम तोड़ती हैं,
मानव के इस युद्ध में देखो,
प्रकृति सबसे पहले मरती है।
बमों की गूंज में दब जाती,
कोयल की मधुर तान,
लोहे की इस दुनिया में खो गया,
हरियाली का सम्मान।
मिट्टी में जहर घुला ऐसा,
बीज भी डरकर सोते हैं,
फूलों की खुशबू की जगह अब,
धुएँ के बादल होते हैं।
किसका जीता, किसका हारा,
कोई हिसाब नहीं होता,
जब धरती माँ ही घायल हो,
तो कोई भी विजेता नहीं होता।
रुक जाओ अब ऐ इंसानों,
ये आग तुम्हें ही जलाएगी,
अगर प्रकृति खत्म हुई तो,
तुम्हारी सांसें भी रुक जाएंगी।

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